Reading the NEP 14: Who Regulates, Who Governs हिन्दी बहुत से कॉलेजों में प्रत्यायन की फ़ाइलों से भरी एक अलमारी होती है, हर मानदंड के लिए एक फ़ाइल। उन्हें भरने के लिए किसी ने हफ़्तों देर तक रुककर काम किया। हमारी फ़ाइलें पिछले महीने चली गईं। अब स्टाफ़ रूम कहता है, एक रेगुलेटर यूजीसी की जगह लेगा। ले ली क्या? अक्टूबर दो हज़ार छब्बीस तक, नहीं। एकल नियामक का विधेयक संसद की एक समिति के पास है। नीति में इसके पक्ष की बात पेज छियालीस से शुरू होती है। दशकों से उच्चतर शिक्षा का विनियमन बहुत सख़्त रहा है, जिसे बहुत कम प्रभाव के साथ विनियमित करने का प्रयास किया गया है। इसका उपाय है चार कामों को अलग करना: विनियमन, प्रत्यायन, फंडिंग और शैक्षणिक मानकों का निर्धारण। हर काम एक स्वतंत्र संस्था को जाता है, और चारों एक प्रमुख संस्था, भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग, के तहत रहते हैं। कॉमर्स पढ़ाने वाली मेरी दोस्त से शुरू करें। इस ढाँचे में उसके नए कोर्स को मंज़ूरी कौन देगा? अध्याय यह काम किसी नियामक को नहीं देता। एक सामान्य शिक्षा परिषद तय करती है कि एक स्नातक को क्या जानना चाहिए और क्या कर पाना चाहिए। उस ढाँचे के भीतर संस्थान अपना पाठ्यक्रम ख़ुद तैयार कर सकते हैं। कृषि, अध्यापक शिक्षा और आर्किटेक्चर जैसे क्षेत्रों की परिषदें यह ढाँचा लिखने में मदद करती हैं, बिना किसी नियामक भूमिका के। और जाँच कौन करता है? वो सारी फ़ाइलें पढ़ता कौन है? प्रत्यायन करने वाली संस्थाएँ। एक राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद की देखरेख में स्वतंत्र संस्थाएँ जाँच करती हैं, और प्रत्यायन विनियमन का मुख्य साधन बन जाता है। पहले ग्रेड मिलते हैं। आगे चलकर, नीति कहती है, यह सीधा हाँ या ना बन जाता है। नियामक ख़ुद प्रकटीकरण के ज़रिए काम करेगा। हर संस्थान को अपना वित्त, ऑडिट, संकाय, पाठ्यक्रम और परिणाम एक सार्वजनिक वेबसाइट पर डालने होंगे। नीति इसे लचीला लेकिन सख़्त कहती है: कुछ महत्वपूर्ण मामले, बहुत प्रभावी ढंग से नियंत्रित। संस्थानों से न्यूनतम मानदंडों का पालन करवाने के लिए वह कड़े कदमों के साथ कठोर अनुपालन उपायों का वादा करती है, ग़लत प्रकटीकरण पर दंड के साथ। एक ही विनियामक परिषद चिकित्सा और विधि को छोड़कर पूरी उच्चतर शिक्षा को देखेगी। फंडिंग वाला अंग, एक अनुदान परिषद, पारदर्शी मानदंडों पर संस्थानों को फंड देगा, जिनमें उनकी विकास योजनाएँ भी शामिल हैं। और हर संस्थान, सार्वजनिक हो या निजी, गैर-लाभकारी ऑडिट मानक पूरे करे, और कोई अधिशेष हो तो उसे शिक्षा में फिर से लगाए। प्रिंसिपल जिसका ज़िक्र करते रहते हैं, वो बोर्ड? उसे कौन नियुक्त करता है? अध्याय उन्नीस में, हर संस्थान पंद्रह वर्षों में ग्रेडेड प्रत्यायन के ज़रिए अपनी स्वायत्तता हासिल करने का लक्ष्य रखे। दो हज़ार पैंतीस तक उसका एक बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स हो, जो उसे किसी भी बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त चलाए और उसका प्रमुख नियुक्त करे। फिर बोर्ड ख़ुद को नया करता रहता है: उसकी अपनी विशेषज्ञ समिति नए सदस्य खोजती है, और बोर्ड उन्हें चुनता है। पहला बोर्ड कौन बनाएगा, यह उस क़ानून पर छोड़ा गया है जिसका नीति वादा करती है। एक बोर्ड, जो अपने सदस्य भी ख़ुद चुने और मेरे प्रिंसिपल भी। इसमें टीचर कहाँ हैं? उस पैराग्राफ़ में उनका ज़िक्र नहीं है। अध्याय में संकाय एक बार आता है: संस्थान की विकास योजना बोर्ड, संस्थागत लीडरों, संकाय, छात्रों और कर्मचारियों की संयुक्त भागीदारी से तैयार होगी। अनुदान परिषद संस्थान को फंड देते समय उस योजना को ध्यान में रखेगी। अक्टूबर दो हज़ार छब्बीस तक, इनमें से कोई नई संस्था नहीं बनी है। यूजीसी और तकनीकी शिक्षा तथा अध्यापक शिक्षा की परिषदें अब भी विनियमन करती हैं। अपने दो हज़ार पच्चीस के विनियमों के तहत यूजीसी किसी संस्थान को डिग्री देने से रोक सकता है। इनकी जगह लेने वाला विधेयक, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, पंद्रह दिसंबर दो हज़ार पच्चीस को लोकसभा में पेश हुआ। अगले दिन उसे संसद की एक संयुक्त समिति को भेज दिया गया। अक्टूबर दो हज़ार छब्बीस तक समिति ने रिपोर्ट नहीं दी है, और विधेयक पारित नहीं हुआ है। जैसा पेश हुआ, उसमें विधेयक ढाँचे का बड़ा हिस्सा रखता है: एक आयोग, जिसमें विनियमन, प्रत्यायन और मानकों की परिषदें हैं। चिकित्सा, विधि और कुछ दूसरे पेशेवर पाठ्यक्रम इसके बाहर रहते हैं। इसमें कोई अनुदान परिषद नहीं है। केंद्र से वित्तपोषित संस्थानों के अनुदान शिक्षा मंत्रालय के ज़रिए जाएँगे, और आयोग के ख़िलाफ़ अपीलें केंद्र सरकार के पास। विनियमन और मानकों की परिषदों में एक-एक सीट किसी राज्य के नामित सदस्य के लिए है, जिस पर राज्य बारी-बारी से आते हैं। प्रत्यायन अब भी राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद करती है। दो हज़ार पच्चीस में रिश्वत के एक मामले के बाद उसने कई महीनों तक प्रत्यायन रोक दिया। दिसंबर दो हज़ार पच्चीस में वह अब भी अक्षर ग्रेड दे रही थी, और हाँ-या-ना वाली व्यवस्था शुरू नहीं हुई थी। अक्टूबर दो हज़ार छब्बीस तक, बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स के लिए नीति ने जिस क़ानून का वादा किया था, वह पारित नहीं हुआ है। और ज़्यादातर कॉलेज अब भी किसी विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं। कुलपतियों के बारे में, जनवरी दो हज़ार पच्चीस का यूजीसी का एक मसौदा खोज समिति की अध्यक्षता कुलाधिपति के नामित व्यक्ति को देता है। छह राज्यों ने इसे वापस लेने की माँग की। अक्टूबर दो हज़ार छब्बीस तक, यह मसौदा यूजीसी की विनियमों की सूची में नहीं है। तो एक रेगुलेटर मेरे जैसे कॉलेजों को आज़ाद करेगा, या दिल्ली से और कसकर बाँधेगा? चेन्नई की साई यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति जमशेद भरूचा ने दो हज़ार चौबीस में लिखा कि भारी और कठोर विनियमन ने भारतीय उच्चतर शिक्षा को पीछे रखा है। उनके अनुसार, पुलिसिंग और सुविधा देने के बीच का संतुलन लंबे समय से पुलिसिंग की ओर झुका रहा। उन्होंने नीति को उससे एक नाता तोड़ने के रूप में पढ़ा, और आईआईटी को इसका सबूत बताया कि स्वायत्तता से उत्कृष्टता आती है। उच्चतर शिक्षा नीति अनुसंधान केंद्र के संस्थापक निदेशक एन. वी. वर्गीज़ ने सितंबर दो हज़ार छब्बीस में कहा कि नीति ने चार अंगों का वादा किया था। उनमें से एक फंडिंग के लिए था। उनके अनुसार, फंडिंग को बाहर निकालने से वित्तीय ज़िम्मेदारी के बिना अधिकार और शक्ति केंद्रित हो जाती है। उन्होंने जोड़ा कि किसी विश्वविद्यालय की स्वायत्तता इस पर निर्भर है कि उसे पैसा कैसे मिलता है। बिल पर मेरा वोट नहीं चलता। डिपार्टमेंट से मैं क्या कर सकती हूँ? पता कीजिए कि आज आपका कार्यक्रम किन संस्थाओं के प्रति जवाबदेह है। किसी संबद्ध ग्रामीण कॉलेज में इतिहास अपने विश्वविद्यालय और यूजीसी के प्रति जवाबदेह है। किसी राज्य विश्वविद्यालय में अध्यापक शिक्षा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के प्रति भी। फिर पढ़िए कि आपका संस्थान अपनी वेबसाइट पर और प्रत्यायन की फ़ाइलों में आपके विभाग के बारे में क्या प्रकाशित करता है। नीति के ढाँचे में यही सार्वजनिक रिकॉर्ड नियामक जाँचता है, इसलिए इसका सही होना ज़रूरी है। और संस्थान की विकास योजना देखने को माँगिए, और यह कि उसमें आपके विभाग के बारे में क्या लिखा है। नीति चाहती है कि उसे लिखने वालों में संकाय भी हो, और यूजीसी ने फ़रवरी दो हज़ार चौबीस में इन योजनाओं के लिए दिशानिर्देश जारी किए। हमारी वेबसाइट कहती है कि डिपार्टमेंट में नौ टीचर हैं। हम पाँच हैं, और उनमें से दो गेस्ट फ़ैकल्टी हैं। तो उस रिकॉर्ड में सुधार चाहिए। पूरी नीति और हमारे स्रोतों के लिंक नीचे दिए गए हैं। अगली बार, पैसा, समय-सीमाएँ और आप क्या कर सकते हैं।