Reading the NEP 02: Where It Comes From हिन्दी अगर आप एनईपी पर किसी ओरिएंटेशन में बैठ चुके हैं, तो शायद आपने इसे चौंतीस साल में पहली नई शिक्षा नीति कहते सुना होगा। हमारे ओरिएंटेशन में एक सीनियर साथी ने मेरी ओर झुककर फुसफुसाया कि ये सब वो पहले सुन चुके हैं। नीति के पेज साठ पर एक वाक्य है, जो उन्हें जाना-पहचाना लगेगा। इसमें लिखा है कि शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत उन्नीस सौ अड़सठ में लक्ष्य था, फिर छियासी में, और फिर बानवे में। और यह भी कि खर्च वहाँ तक कभी नहीं पहुँच पाया। बाक़ी जगहों पर नीति अपने अतीत के बारे में कम ही कहती है। इसके परिचय में लिखा है कि यह नीति प्राचीन भारतीय ज्ञान की समृद्ध परंपरा के आलोक में तैयार की गई है। इसमें प्राचीन भारत के चार विश्व-स्तरीय संस्थानों के नाम हैं, जिनमें तक्षशिला और नालंदा भी हैं। उसी पेज पर एक पैराग्राफ़ कहता है कि उन्नीस सौ छियासी की नीति के अधूरे काम को यहाँ पूरा करने का प्रयास है। क्या इसमें उन रिपोर्टों का ज़िक्र है जिनके बारे में हम सबको पढ़ना पड़ा था, राधाकृष्णन, कोठारी और यशपाल? कोठारी आयोग का ज़िक्र एक बार आता है, स्कूलों पर एक अध्याय में। राधाकृष्णन और यशपाल का ज़िक्र नहीं है। उन्नीस सौ उनचास में राधाकृष्णन आयोग ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और तीन भाषाओं की पढ़ाई का प्रस्ताव रखा। उसकी रिपोर्ट भी तक्षशिला और नालंदा को याद करती है। उन्नीस सौ छियासठ में कोठारी आयोग ने तीन भाषाओं का फ़ॉर्मूला, कॉलेजों की स्वायत्तता और छह प्रतिशत खर्च का लक्ष्य प्रस्तावित किया। उन्नीस सौ अड़सठ की नीति ने भाषाएँ और लक्ष्य अपनाए। उन्नीस सौ छियासी की नीति ने लक्ष्य दोहराया, और बानवे में हुई समीक्षा ने उसकी पुष्टि की। दो हज़ार नौ में यशपाल समिति ने उच्चतर शिक्षा और शोध के लिए एक ही आयोग की माँग की। फिर दो हज़ार ग्यारह में एक विधेयक आया और अठारह में एक मसौदा विधेयक, पर कोई भी क़ानून नहीं बना। नीति को बनाने का काम जनवरी दो हज़ार पंद्रह में परामर्श से शुरू हुआ। सरकार के हिसाब से क़रीब दो लाख सुझाव आए। टी. एस. आर. सुब्रमण्यन की समिति ने दो हज़ार सोलह में रिपोर्ट दी। मई दो हज़ार उन्नीस में के. कस्तूरीरंगन की समिति ने चार सौ चौरासी पन्नों का मसौदा सौंपा। जुलाई दो हज़ार बीस में मंत्रिमंडल ने छियासठ पन्नों का अंतिम पाठ मंज़ूर किया। चार सौ चौरासी पन्नों से छियासठ। रास्ते में क्या छूटा? मसौदे में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का प्रस्ताव था, और शोध के लिए हर साल बीस हज़ार करोड़ रुपये के अनुदान का। उसमें सार्वजनिक खर्च में शिक्षा का हिस्सा दोगुना करने का प्रस्ताव भी था, दस प्रतिशत से बीस। इन तीनों में से कोई भी अंतिम पाठ में नहीं है। छह प्रतिशत, तीन भाषाएँ, कॉलेजों की स्वायत्तता और एक नियामक, ये सब दो हज़ार बीस से पहले काग़ज़ पर थे। दो हज़ार बीस का पाठ निकास बिंदुओं वाली डिग्री और क्रेडिट का एक बैंक जोड़ता है। संबद्धता पंद्रह साल में धीरे-धीरे ख़त्म होनी है, और लक्ष्य दो हज़ार चालीस तक जाते हैं। छह प्रतिशत उन्नीस सौ अड़सठ से चला आ रहा है, और रेगुलेटर दो हज़ार नौ से। इस बार की तारीख़ों पर मैं भरोसा क्यों करूँ? छह प्रतिशत के लिए पाठ कोई तारीख़ तय नहीं करता। केंद्र और राज्यों को वहाँ जल्द से जल्द पहुँचना है। जून दो हज़ार छब्बीस में शिक्षा पर संसद की स्थायी समिति ने पाया कि खर्च अब भी उससे बहुत नीचे है। अगस्त दो हज़ार तेईस में संसद ने अनुसंधान फ़ाउंडेशन के लिए क़ानून पारित किया। एकल नियामक दिसंबर दो हज़ार पच्चीस से एक विधेयक है। अक्टूबर दो हज़ार छब्बीस तक यह अब भी एक संयुक्त समिति के पास है। लोग कहते रहते हैं कि संसद में इस नीति पर कभी बहस ही नहीं हुई। क्या ये सच है? दो हज़ार उन्नीस में सांसदों ने मसौदे के बारे में सवाल पूछे। उसी साल सितंबर में केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की एक विशेष बैठक में उन्नीस राज्यों के मंत्रियों ने उस पर चर्चा की। मंत्रिमंडल की मंज़ूरी से पहले, हमें किसी भी सदन में बहस का, या मतदान का, कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। जे. एस. राजपूत कभी राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के निदेशक थे। वे इस नीति को कोठारी आयोग से चली आ रही एक कड़ी में रखते हैं। वे लिखते हैं कि शिक्षकों, विद्वानों और संस्थानों ने अभूतपूर्व उत्साह से इसे तैयार करने में हाथ बँटाया। उनके मुताबिक़, जहाँ कुछ राज्य इसमें देर कर रहे हैं, वहाँ कारण शायद अकादमिक न हों। अनीता रामपाल प्राथमिक कक्षाओं के लिए परिषद की पाठ्यपुस्तक समितियों की अध्यक्ष रहीं। वे लिखती हैं कि जब महामारी में कॉलेज बंद थे, तब नीति संसद में बिना किसी चर्चा के मंज़ूर कर दी गई। वे बताती हैं कि दो हज़ार उन्नीस के मसौदे पर उसके सदस्यों के नाम और हस्ताक्षर थे। अंतिम पाठ में किसी का नाम नहीं है, और वे पूछती हैं कि इसके शब्दों की ज़िम्मेदारी किसकी है। हममें से बहुत कम लोग शिक्षा का इतिहास पढ़ाते हैं। बाक़ी हम लोग इसका क्या करें? जब कोई वक्ता किसी चीज़ को नया कहे, तो पूछिए कि उसका प्रस्ताव पहली बार कब आया था। जो साथी फुसफुसाए थे, उन्हें शायद उन्नीस सौ छियासी की नीति याद हो। फिर किसी पुरानी रिपोर्ट के दस पन्ने पढ़िए। उन्नीस सौ उनचास और दो हज़ार नौ की रिपोर्टें मुफ़्त हैं, लिंक नीचे हैं। और कोई एक विचार अपने विषय में ले जाइए। अर्थशास्त्र की कक्षा उन्नीस सौ छियासठ से छह प्रतिशत का सफ़र देख सकती है। किसी ग्रामीण कॉलेज में भाषा की कक्षा तीन भाषाओं की जड़ें उन्नीस सौ उनचास तक खोज सकती है। इतिहास या राजनीति विज्ञान की कक्षा दो हज़ार उन्नीस के मसौदे का सारांश अंतिम पाठ के बगल में रख सकती है। वो मार्च में रिटायर होंगे। जाने से पहले उनसे छियासी के बारे में पूछ लूँ। हो सकता है उनके पास अब भी उसकी प्रति हो। पूरी नीति और हमारे स्रोतों के लिंक नीचे दिए गए हैं। अगली बार, वे छात्र जो आपकी पहले साल की कक्षा में आएँगे।