Reading the NEP 01: The Document on Your Desk हिन्दी आपके स्टाफ़ रूम के बाहर लगे नोटिस बोर्ड पर शायद कोई सर्कुलर होगा, जिस पर ये शब्द लिखे हैं। एनईपी दो हज़ार बीस के अनुसार। छह साल से लोग मुझे बता रहे हैं कि एनईपी क्या कहती है, और मैंने इसे कभी खोला ही नहीं। हममें से ज़्यादातर ने नहीं खोली। यह छियासठ पन्नों की है, और पेज चार पर एक वाक्य आपके बारे में है। शिक्षा व्यवस्था में किये जा रहे बुनियादी बदलावों के केंद्र में अवश्य ही शिक्षक होने चाहिए। इस सीरीज़ में हम ये छियासठ पन्ने साथ पढ़ेंगे, और पता करेंगे कि उनका क्या हुआ। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उनतीस जुलाई दो हज़ार बीस को राष्ट्रीय शिक्षा नीति मंज़ूर की। इसने उन्नीस सौ छियासी में लिखी गई एक नीति की जगह ली, और यह ख़ुद को इक्कीसवीं शताब्दी की पहली शिक्षा नीति कहती है। इसमें सत्ताईस अध्याय हैं। उच्चतर शिक्षा पर अध्याय नौ से उन्नीस हैं, पेज तैंतीस से पेज पचास तक। आपके कॉलेज से वास्ता इन्हीं अठारह पन्नों का है। दिल्ली से आए अठारह पन्नों में, हमारे जैसे छोटे एफ़िलिएटेड कॉलेज के लिए भी कुछ है क्या? अध्याय दस आपके जैसे कॉलेजों के बारे में है। संबद्ध कॉलेजों की व्यवस्था धीरे-धीरे, पंद्रह वर्षों में समाप्त होनी है, और हर कॉलेज से अपेक्षा है कि वह बढ़कर अपनी डिग्री ख़ुद देने वाला कॉलेज बने। यही अध्याय चाहता है कि दो हज़ार पैंतीस तक उच्चतर शिक्षा में नामांकन अनुपात पचास प्रतिशत हो जाए। और आख़िर के क़रीब, नीति कहती है कि शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च बढ़कर जीडीपी का छह प्रतिशत हो। वादे बहुत हैं। क्या इनमें से कुछ भी मुझ पर लागू है? अपने आप में, नहीं। नीति बताती है कि सरकार क्या करना चाहती है। वह बाध्यकारी तभी बनती है जब कोई उसके किसी हिस्से को क़ानून, विनियम या आदेश में बदल दे, और यह काम केंद्र और राज्यों के बीच बँटा हुआ है। पैराग्राफ़ ग्यारह दशमलव नौ के एक वाक्य के पीछे चलिए। स्नातक उपाधि तीन या चार वर्ष की अवधि की होगी, जिसमें उपयुक्त प्रमाणपत्र के साथ निकास के कई विकल्प होंगे। राज्यों में कर्नाटक ने सबसे पहले क़दम उठाया। अगस्त दो हज़ार इक्कीस में उसने आदेश जारी किया कि नीति उसी शैक्षणिक वर्ष से लागू हो, और उसके कॉलेजों में ऐसी डिग्री के लिए दाख़िले शुरू हुए, जिसमें चौथा साल वैकल्पिक था। दिसंबर दो हज़ार बाईस में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इस वाक्य का गणित तय किया। उसके क्रेडिट फ़्रेमवर्क में तीन साल के एक सौ बीस क्रेडिट हैं, और चार साल के एक सौ साठ। अप्रैल दो हज़ार पच्चीस में उसने ये संख्याएँ एक विनियम में दर्ज कर दीं। इसके बाद मामला दूसरे हाथों में होता है। राज्य विश्वविद्यालय में राज्य सरकार तय करती है कि नई संरचना कैसे अपनाई जाए, और कभी-कभी यह भी कि अपनाई जाए या नहीं। फिर विश्वविद्यालय उसे एक अध्यादेश में लिखता है, और अध्ययन मंडल उसके हिसाब से सिलेबस दोबारा लिखता है। और एक सुबह हमारे नोटिस बोर्ड पर नया टाइमटेबल लगा होता है। मई दो हज़ार चौबीस में कर्नाटक ने नए छात्रों के लिए चार साल की डिग्री वापस ले ली, और तीन साल पर लौट आया। एक साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने वह याचिका ख़ारिज कर दी, जिसमें उससे तीन राज्यों को नीति लागू करने का आदेश देने को कहा गया था। इसलिए एक राज्य का शिक्षक और दूसरे राज्य का शिक्षक एनईपी कहें, तो दोनों का मतलब अलग-अलग हो सकता है। छह साल बाद, दो हज़ार तेईस-चौबीस का ताज़ा सरकारी सर्वेक्षण नामांकन अनुपात तीस प्रतिशत बताता है, जबकि दो हज़ार पैंतीस तक का लक्ष्य पचास है। और नीति जिस एकल नियामक की माँग करती है, वह अब भी संसद के सामने एक विधेयक ही है। नीति ने ख़ुद को समय दिया है। उसका आख़िरी पैराग्राफ़ कहता है कि दो हज़ार तीस-चालीस के दशक तक पूरी नीति लागू हो चुकी होगी। और दो हज़ार चालीस तक, शुरुआती पन्ने कहते हैं, भारत में एक ऐसी शिक्षा प्रणाली हो जो कि किसी से पीछे नहीं है। और ये अच्छी भी है? जिन लोगों ने भारतीय शिक्षा पर गहराई से सोचा है, वे इस पर एकमत नहीं हैं। उनमें से दो ये रहे। मसौदा समिति के अध्यक्ष रहे अंतरिक्ष वैज्ञानिक, दिवंगत के. कस्तूरीरंगन ने कहा था कि इस नीति का मक़सद हर नागरिक के जीवन को छूना और एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज बनाना है। उदार शिक्षा को, जो विज्ञान और मानविकी के आपसी रिश्तों को खोजती है, उन्होंने सदियों पुराना भारतीय विचार कहा, जिसे अब नए रूप में पहचान मिल रही है। श्याम मेनन, जो अपने करियर के ज़्यादातर समय दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षाशास्त्र पढ़ाते रहे, लिख चुके हैं कि पिछली नीतियों के पास संसद की जाँच से मिली वैधता थी, जिसे इस नीति ने दरकिनार कर दिया। उन्हें शक है कि राज्य, जो शिक्षा पर ज़्यादातर सार्वजनिक खर्च उठाते हैं, वह खर्च उठा पाएँगे जिसका वादा केंद्र ने उनकी ओर से किया है। अच्छा, ठीक है। तो इस सबका मैं करूँ क्या? वो अठारह पन्ने पढ़िए। अध्याय नौ से उन्नीस में क़रीब एक घंटा लगता है, पेंसिल लेकर। अगर आप भाषा, संगीत या कोई कला पढ़ाते हैं, तो अध्याय बाईस भी जोड़ लीजिए। पैराग्राफ़ बारह दशमलव दो पर पहुँचें, तो उस वाक्य पर निशान लगाइए जो कहता है कि उच्चतर शिक्षा के व्यापक ढाँचे में, संस्थानों और संकायों को पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि और आकलन पर नवाचार करने की स्वायत्तता देनी होगी। उसे पेज चार वाले वाक्य के बगल में रखिए। और जब अगला सर्कुलर कहे “एनईपी के अनुसार”, तो पूछिए कि वह किस दस्तावेज़ पर टिका है: यूजीसी का विनियम, राज्य सरकार का आदेश, या आपके विश्वविद्यालय का अध्यादेश। आपका काम उसी दस्तावेज़ से तय होता है, इसलिए अगला उसी को पढ़िए। एक घंटा तो निकाल लूँगी। यूनिवर्सिटी से वो ऑटोनॉमी निकलवाने में शायद ज़्यादा वक़्त लगे। हो सकता है। पूरी नीति और हमारे स्रोतों के लिंक नीचे दिए गए हैं। अगली बार, ये छियासठ पन्ने कहाँ से आए।