Monsoon Semester 02: From Chains to Conversations हिन्दी दूसरा हफ़्ता। फ़िज़िक्स कॉरिडोर के एक दरवाज़े पर, एक छोटा-सा स्टिकर है। ज़्यादातर लोग पास से गुज़र जाते हैं। कुछ लोग खटखटाते हैं। आ जाओ। खुला है। सॉरी, मैम। क्या ये वेलनेस सेंटर है? ठीक-ठीक नहीं। वेलनेस सेंटर सड़क के उस पार है, लाइब्रेरी के पीछे। ओह। सॉरी, मैम। वो स्टिकर, मुझे लगा— ज़्यादातर लोग यही सोचते हैं। चलो, मैं छोड़ आती हूँ। मुझे वैसे भी टहलना था। मैम, ज़रूरत नहीं— मुझे पता है। मैम? चाय? दस मिनट! पहली बार? जी, मैम। मुझे ये भी नहीं पता, कि क्या बोलूँगी। पता होना ज़रूरी नहीं। कहीं से भी शुरू करो। बारिश से शुरू करो। आओ, आओ। मैम, आप तो पूरी भीग गईं। जुलाई है। सब भीगे हुए हैं। मैं आप दोनों को छोड़ती हूँ। कोई मेरी चाय गरम रख रहा है। बारह मिनट। आपकी चाय ने हार मान ली। ठंडी चाय भी, चाय ही है। वो कौन थी? कोई, जिसे रास्ता चाहिए था। इस बारिश में? खासकर इस बारिश में। एक बात पूछूँ? वो स्टिकर। क्यों लगा है आपके दरवाज़े पर? क्योंकि स्टूडेंट्स वैसे भी मेरा दरवाज़ा खटखटाते हैं। स्टिकर मुझे याद दिलाता है, कि उन्हें कहाँ छोड़ना है। पर आप क्यों? आप फ़िज़िक्स पढ़ाती हैं। आप काउंसलर नहीं हैं। इसका जवाब लंबा है। कितना लंबा? करीब दो सौ साल। मेरी दस बजे क्लास है। तो चाय पियो, और जल्दी-जल्दी सुनो। फ़िज़िसिस्ट कुछ भी नहीं समझा सकता, बिना डायग्राम के। ये बिंदु एक इंसान है, जो बहुत मुश्किल में है। कोई स्टूडेंट? कोई भी। और ज़्यादातर इतिहास में, सवाल यही रहा है: किसे इजाज़त है, उसकी मदद करने की? पेरिस, सत्रह सौ नब्बे का दशक। फ़िलिप पिनेल नाम का डॉक्टर, ज़ंजीरों में बंधे मरीज़ों को देखता है, और कुछ अलग आज़माता है। बातचीत, और सार्थक काम, ज़ंजीरों की जगह। इसे “मॉरल ट्रीटमेंट” कहा गया। पहला घेरा। एक डॉक्टर, जो सुनता है। लंदन, उन्नीस सौ तिरपन। समैरिटन्स को पहली कॉल आती है। आइडिया लगभग ज़रूरत से ज़्यादा सीधा है। लाइन के दूसरी तरफ़, एक वॉलंटियर, जो बस सुनता है। डॉक्टर नहीं? डॉक्टर नहीं। दूसरा घेरा। फिर, घर के और करीब। उन्नीस सौ बयासी में, भारत एक राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू करता है। उन्नीस सौ छियानवे में, ज़िला कार्यक्रम। देखभाल, वहाँ के करीब आने लगती है, जहाँ लोग असल में रहते हैं। और फिर, दो हज़ार एक। एरवाडी, तमिलनाडु में। मानसिक बीमारी वाले लोगों को वहाँ ज़ंजीरों में रखा जा रहा था। और आग लग गई। मैंने बस पढ़ाना शुरू किया था। पेरिस के दो सौ साल बाद, और अब भी ज़ंजीरें। उसके बाद, उनके अधिकार देश का सवाल बन गए। वो मुश्किल हिस्सा था। अब, वो हिस्सा जो मुझे पसंद है। दो हज़ार सोलह से तेईस तक, सावधानी से किए गए ट्रायल्स ने जाँचा, कि क्या प्रशिक्षित गैर-विशेषज्ञ, यानी वो लोग जो मानसिक स्वास्थ्य प्रोफ़ेशनल नहीं हैं, मदद कर पाएँगे। वो कर पाए। दादी-नानियाँ, ज़िम्बाब्वे की फ़्रेंडशिप बेंच पर। गैर-विशेषज्ञ काउंसलर, गोवा में। गाँव के वॉलंटियर, गुजरात में, आत्मीयता नाम के कार्यक्रम में। दादी-नानियाँ? एक बेंच पर। ट्रेनिंग, और फिर भरोसा। भारत का मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, दो हज़ार सत्रह, मानकर चलता है कि आत्महत्या की कोशिश करने वाला व्यक्ति गंभीर तनाव में है। उनकी देखभाल होनी चाहिए, उन पर मुकदमा नहीं। दो हज़ार बाईस में आई राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति, और एक राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन। अगस्त दो हज़ार छब्बीस तक, इस पर तैंतालीस लाख से ज़्यादा कॉल आ चुकी थीं। तैंतालीस लाख। और दो हज़ार पच्चीस और छब्बीस में, सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस, उसकी नेशनल टास्क फ़ोर्स, और यूजीसी की नई गाइडलाइंस, इस दायरे को ले गईं हर क्लासरूम तक। डॉक्टर। फिर वॉलंटियर। फिर प्रशिक्षित पड़ोसी। और अब, टीचर। हर नया घेरा, अंदर वाले घेरों को साथ रखता है। टीचर, डॉक्टरों या काउंसलरों की जगह नहीं लेते। वो दायरा बढ़ाते हैं। तो अगला घेरा... हम हैं। हमेशा से हम ही थे। अब लिखित में है। मैम, मैं एल्गोरिदम पढ़ाता हूँ। मुझे इसकी ट्रेनिंग किसी ने नहीं दी। दादी-नानियों को भी किसी ने ट्रेनिंग नहीं दी थी। जब तक किसी ने दी नहीं। आपने अभी मेरी तुलना दादी से की? एक बहुत जवान दादी। कोई तुमसे फ़राह बनने को नहीं कह रहा। बस रास्ता पता हो, उसके दरवाज़े तक। और वो स्टिकर? सबसे छोटा घेरा, जो मैं बना सकती हूँ। स्टूडेंट उसे पढ़कर, दो बातें जान लेता है। मदद है। और इस टीचर से पूछूँ, तो मेरी हँसी नहीं उड़ेगी। जब आप स्टूडेंट थीं, तब किसी के दरवाज़े पर स्टिकर होता था? नहीं। मेरे पास एक टीचर, और एक सवाल था। मैं खुशकिस्मत थी। किसी को किस्मत के भरोसे नहीं रहना चाहिए। “संबंधित अधिकारी।” वाह, अर्जुन। बहुत अपनापन है। मैम? एक एक्स्ट्रा होगा? मैंने अपने कोर्स पेज पर वेलनेस सेंटर डाल दिया, कल रात। बढ़िया। अब क्लास में भी बोलो। कोर्स पेज कोई नहीं पढ़ता। कोई नहीं? तुम पढ़ते थे, अठारह की उम्र में? सही बात। फ़राह भेजती है मुझे, हर जुलाई एक डिब्बा। लो, दो रख लो। एक तो खो दोगे। नया स्टिकर, सर? बढ़िया। कोने दबा दीजिए। तीस मानसून देखे हैं मैंने यहाँ। अगस्त तक, बारिश नीचे घुस जाती है। अब ये टिकेगा, सर। एक और स्लाइड। नहीं आएगी एग्ज़ाम में। अगर कुछ भारी लगने लगे — पढ़ाई, घर, कुछ भी — तो वेलनेस सेंटर फ़्री है, और तुम्हारे लिए है। डिटेल्स कोर्स पेज पर हैं। और अगर वो न मिलें, तो मेरे दरवाज़े का स्टिकर ढूँढना। सर, क्या ये सच में फ़्री है? सच में फ़्री। मैंने चेक किया। इस हफ़्ते ये आज़माइए: अपने सिलेबस और कोर्स पेज पर, काउंसलिंग सेंटर की संपर्क जानकारी जोड़िए, जैसा सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन पाँच कहती है। और याद रखने के लिए, एक वाक्य। मदद हमेशा आम लोगों के ज़रिए फैली है। मदद से जुड़ी जानकारी और सोर्स, इस वीडियो के नीचे दिए गए हैं। अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।